Read in Hindi: An excerpt from Arundhati Roy’s memoir, ‘Meri Maa Meri Gangster’
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मेरी माँ अपने झगड़ों का बोझ और रोज़ाना की अपनी बेइज़्ज़ती का सारा ग़ुस्सा मेरे भाई और मुझ पर उतारती थीं। अकेले हम ही उनका सुरक्षित आसरा थे। पहले से ही ख़राब उनका मिज़ाज, अब और बेतुका और बेक़ाबू हो गया। वह किस बात पर ग़ुस्सा हो जाएँगी और किस बात पर ख़ुश, यह अन्दाज़ लगाना या तय कर पाना मेरे लिए असम्भव हो गया। बारूदी सुरंग वाले उस इलाक़े से गुज़रने के लिए मुझे नक़्शे के बिना ही अपना रास्ता खोजना पड़ता था। अक्सर मेरे पाँव और उँगलियाँ और कभी-कभी तो मेरी खोपड़ी भी उड़ जाती, मगर कुछ देर हवा में तैरते रहने के बाद, जादुई तरीक़े से वे फिर अपनी जगह लौट आते।
जब वह मुझसे ग़ुस्सा होतीं, तो मेरे बोलने के तरीक़े की नक़ल उतारा करती थीं। वह बढ़िया नक़्क़ाल थीं और ऐसी नक़ल करतीं कि मैं ख़ुद को उपहास लायक़ ही मान बैठती। मुझे ऐसे हर मौक़े की हर चीज़ साफ़-साफ़ याद है। यहाँ तक कि यह भी कि तब मैंने क्या पहन रखा था। ऐसा लगता था कि जैसे तेज़ धार वाली कैंची से उन्होंने मुझे तसवीरों की किसी किताब से काटकर निकाला हो – मेरी काया गढ़ी हो – और फिर मुझे चिन्दी-चिन्दी कर डाला हो।
पहली बार...
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